Thursday, October 07, 2010

Love wants no wall - जहां मिट गई है मंदिर-मस्जिद के बीच की दीवार - Ejaz

मंदिर-मस्जिद, धर्म और जाति के झगड़े में उलझे लोगों को मुजफ्फरनगर के कांधला कस्बे से सीख लेनी चाहिए। यहां मंदिर-मस्जिद के बीच की दीवारें मिट गई हैं। मस्जिद की नींव पर ही मंदिर की बुलंद दीवार खड़ी है। बीते 150 वर्षों से ये धर्मस्थल साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल बने हुए हैं।
मुजफ्फरनगर के कांधला कस्बे में स्थित जामा मस्जिद में एक तरफ अजान होती है, तो दूसरी ओर लक्ष्मी नारायण मंदिर में घंटे बजते हैं। इन दोनों इमारतों का इतिहास बताता है कि 1391 में फिरोजशाह तुगलक शिकार खेलते हुए इस कस्बे में पहुंचा था। देर हो जाने के कारण उसने वहीं एक उच्च स्थान पर जुमे की नमाज अदा की और बाद में यहीं जामा मस्जिद खड़ी हुई।
कांधला निवासी नुरुल हसन के अनुसार 1840 में इस मस्जिद की मरम्मत हुई। बाद में इसके बराबर में खाली पड़ी जगह पर जब मस्जिद को विस्तार देने का निर्णय लिया गया तो वहां हिन्दुओं ने इसे मंदिर की जगह बताकर काम रुकवा दिया। यह मामला अंग्रेजी शासन काल में अंग्रेजों की अदालत में भी चला और उस समय मुस्लिम समाज के मौलाना महमूद बख्शकांधलवी ने साम्प्रदायिक एकता की मिसाल वाली गवाही दी। उन्होंने अपनी गवाही में कहा था कि मस्जिद के बराबर में खाली जगह मंदिर की ही है, वहां पर मंदिर ही बनाया जाए।
बाद में न्यायालय के आदेश पर यहां मंदिर निर्माण की इजाजत मिली और यहां लक्ष्मी नारायण मंदिर बनाया गया। तब से आज 160 साल हो बीत चुके हैं, और ये दोनों धार्मिक स्थल सांप्रदायिक सौहार्द्र की नींव और दीवार बने खड़े हैं।
कस्बा निवासी अमित कुमार और इरशाद का कहना है कि दोनों धर्मो के बीच यहां प्यार आज भी अनोखा है। मंदिर के पुजारी अजान के समय स्पीकर बंद कर देते हैं। दोनों सम्प्रदाय के लोग बड़ी सहजता और भाईचारे के साथ एक-दूसरे के साथ रहते हैं।
http://www.livehindustan.com/news/location/rajwarkhabre/248-0-139766.html&locatiopnvalue=17

मंगलवार, 05 अक्टूबर, 2010

Monday, October 04, 2010

India has Changed - आ गया है बदलने का वक्त - Ejaz

बीस साल बाद भी उस 80 साल के बुजुर्ग का चेहरा मैं भूल नहीं पाया। झुर्रियों से अटे उस चेहरे से भरभर टपकते आंसू और खरखराती आवाज। वह आवाज आज भी मेरे कानों में गूंजती है। अयोध्या में विवादित जमीन के पास खड़े उस बुजुर्ग ने बड़ी मासूमियत से कहा था- ‘आज अगर राजीव गांधी जिंदा होते तो अमर हो जाते।’ मैंने बस इतना पूछा था बाबा आपको कैसा लग रहा है। यह पूछना था कि वह फफक-फफक कर रो पड़े। मैं उन दिनों जेएनयू में पढ़ रहा था।
सीपीआई ने अयोध्या में रैली का आह्वान किया था। सी. राजेश्वर राव सीपीआई के जनरल सेक्रेटरी थे। मैं और सुहेल रैली में शामिल होने चल पड़े थे। रामजन्म भूमि के नाम पर संघ परिवार का उन्माद अपने उफान पर था। ट्रेन में कई बार मारपीट होते-होते बची थी। बचते-बचाते हम अयोध्या पहुंचे।

स्टेशन से उतर कर पैदल ही हम बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़े। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, सुहेल के चेहरे की लकीरें बदलती जा रही थीं। अचानक एक मोड़ पर सुहेल रुका और बोला मैं अब आगे नहीं जाऊंगा। तुम चले जाओ। डर तो मुझे भी लग रहा था, पर मैं आगे बढ़ता गया। वहां इस बुजुर्ग से मुलाकात हुई।
बुजुर्ग की झुर्रियां मुझसे कह रह थीं कि राममंदिर मुद्दे ने किस तरह से एक तबके को झकझोर दिया था और सुहेल की लकीरें बता रही थीं कि इस धार्मिक उन्माद ने कैसे मुस्लिम तबके में डर और खौफ पैदा कर दिया था। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शक की एक मोटी दीवार खड़ी कर दी गयी थी।

एक तरफ से जितनी तेज हुंकार होती, दूसरी तरफ से उससे तेज आवाज में जवाब देने की कोशिश होती। यह असाधारण दौर था। तर्क और विवेक कहीं किसी काल-कोठरी में छिप गये थे। ऐसे में 30 सितंबर को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया और दोनों तरफ से कटु बातें नहीं हुईं तो मैंने चैन की सांस ली यानी अब साधारण माहौल में बात हो सकती है।
माहौल में इस बदलाव की गंभीरता को कुछ लोग अभी भी समझना नहीं चाहते हैं। इनको अदालत का फैसला पंचायती फैसला लगता है। और वह कहते हैं कि तथ्यों और साक्ष्यों से ज्यादा आस्था पर भरोसा किया गया है, जो खतरनाक है। पर क्या इस साधारण दौर में भी यह कहना विवेकसम्मत होगा कि वह जगह रामलला की नहीं है और उन्हें वहां से हटा देना चाहिये?
कानून की पेचीदगियों में फंसे लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं है कि ऐसा करने का मतलब उस बुजुर्ग के लिये क्या होगा? और क्या महज जमीन के विवाद का नाम देकर फैसला हिंदू या मुसलमान के पक्ष में कर दिया जाता? जिसे हिंदू राममंदिर मान रहे हैं, वह वहां से बेदखल कर दिये जायें या फिर जो उसे मस्जिद कहते हैं, उनसे वो जमीन छीन कर हिंदुओं को दे दी जाती? क्या लोगों को अहसास है कि इससे सुहेल पर क्या असर होता और किस तरह की भावनाएं फिर भड़कतीं? शायद नहीं? पूरी जमीन किसी के भी पक्ष में जाती, दूसरा पक्ष अपने को ठगा हुआ महसूस करता और जाने-अनजाने उसे साजिश की बू आती।
कानून के जानकारों को समझना चाहिये कि यह मसला जमीन का होता तो कभी का निपट गया होता। यह मसला दोनों समुदायों के बीच आस्था का भी होता तो भी दोनों पक्षों के धर्मगुरु हल निकाल लेते। मसला इतिहास से बदला लेने और वर्तमान में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का है।

एक पक्ष को लगता है कि इतिहास में मुस्लिमों ने हिंदुओं पर भारी जुल्म किये हैं और अब बदला लेने का वक्त है। तो मुस्लिम पक्ष को लगता है कि बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच अगर वह एक बार झुक गये तो उन्हें हमेशा झुकना पड़ेगा और मेजोरिटी डेमोक्रेसी उनके लिये तानाशाही का सबब बन जायेगी, क्योंकि संख्या बल में कम होने की वजह से हमेशा उनकी हार होगी।
जस्टिस खान ने अकारण नहीं कहा है कि हमें वह काम दिया गया था, जिसे करने से फरिश्ते भी डरते। चारों तरफ बारूदी सुरंगें बिछी हैं और हमें हल निकालना था। उनका इशारा साफ है कि दोनों पक्षों के इस फाल्स कांशसनेस से तर्को के आधार पर नहीं निपटा जा सकता। एक दूसरे पर लंबे समय तक किया गया अविश्वास यूं नहीं मिटने वाला। और अगर ध्यान से देखें तो हाई कोर्ट का फैसला भी यही कहता है। उसने जमीन का फैसला किया ही नहीं है।
अदालत कह रही है कि दोनों भाइयों को यह समझना होगा कि दोनों को यहीं साथ-साथ रहना है, लिहाजा वह राम के अस्तित्व को भी मानती है और मस्जिद के लिये भी जमीन देती है। वह इशारा करती है कि जितनी जल्दी हो, यह सच्चाई गले उतर जाये तो बेहतर है कि हिंदू और मुसलमान दोनों में से कोई भी हिंदुस्तान छोड़ कर नहीं जाने वाला, और जब यहीं रहना है तो फिर एक दूसरे का सम्मान करते हुए क्यों न रहा जाये, सह-अस्तित्व के भाव से।
ऐसे में राम और मस्जिद पर झगड़ा क्यों? और कब तक? सुकून इस बात का है कि 18 साल बाद अब दोनों पक्षों की जुबान बदली है। जो भरोसा देती है कि दोनों ही सच्चाई समझने लगे हैं। इसलिये संघ कहता है कि हमें ऐसी कोई भी बात नहीं कहनी चाहिये कि किसी को ठेस लगे और मुस्लिम पक्ष मायूस तो है, लेकिन आक्रामक नहीं।
इस समझदारी के बीच अदालत ने दोनों पक्षों के लिये सुलह-सफाई के लिये रास्ता भी तय कर दिया है। एक अति सम्मानित कानूनविद के मुताबिक अदालती फैसले की मूल भावना को समझते हुए दोनों पक्ष मिल-बैठकर बातचीत के जरिये किसी समझौते पर पहुंचें। फिर लोकतंत्र में अदालत का फरमान न मानने का अर्थ है, बहुसंख्यक जनता की नाराजगी मोल लेना, संविधान की गरिमा को ठेस पहुंचाना, लोगों की नजरों में गिरना।

ऐसे में दोनों पक्ष इतिहास और अस्तित्व के संकट से निकल कर वर्तमान में सांस लें और किसी भी फार्मूले को स्वीकार कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटायें, साथ ही इस विवाद को हमेशा के लिये खत्म करें। यही वक्त की नजाकत है और इसीलिये अल्लामा इकबाल के हवाले से जस्टिस खान लिखते हैं कि न समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तांवालो।

-Ashutosh 
लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/57-62-140642.html

Thursday, September 30, 2010

Ram Nam - राम नाम सत्य है - Ejaz

रामचन्द्र जी की शान इससे बुलंद है कि  कलयुगी जीव उन्हें न्याय दे सकें, और राम चन्द्र जी के राम की महिमा इससे भी ज्यादा बुलंद कि उसे शब्दों में पूरे तौर पर बयान किया जा सके संक्षेप  में यही कहा जा सकता है की राम नाम सत्य है और सत्य में ही मुक्ति है। अब राम भक्तों को राम के सत्य स्वरुप को भी जानने का प्रयास करना चाहिए, इससे भारत बनेगा विश्व नायक, हमें अपनी कमज़ोरियों को अपनी शक्ति में बदलने का हुनर अब सीख लेना चाहिए।

Tuesday, September 28, 2010

Unity and Humanity ईश्वर एक है, धरती है, कौन विरोध करता है मेरी बात का -Ejaz

कश्मीर को लेकर गैरमुसलिम समाज आमतौर पर भ्रमित है,रियासत जम्मू एंड कश्मीर के जो मुस्लमान नेता अलगाववादी आन्दोलन चला रहे हैं ,उसे शेष भारत के मुसलमानों का कोई समर्थन प्राप्त नहीं है यही वजह है कि शेष भारत से कोई भी मुस्लमान उनके सशस्त्र आन्दोलन में आज तक शरीक नहीं हुआ। उनके अलगाववादी आन्दोलन के बारे में सवाल उन कश्मीरी लेखकों से पूछा जाना चाहिए जो कि अलगाववाद के समर्थक हैं न कि हर एक भारतीय मुस्लमान से । कश्मीर से हिन्दुओं को भगाए जाने का सवाल कश्मीरियों से पूछिए क्योंकि कश्मीर को अलग करने की मांग को हम नाजायज़ मानते हैं क्योंकि तोड़ना नाजायज़ और जोड़ना इस्लाम में वाजिब है हम तो चाहते हैं की बंगलादेश और पाकिस्तान भी जुड़ें और देश भी ताकि साड़ी धरती 'एक'  हो जाये सारी धरती हमारी माँ है इसलिए हम भारत को माता नहीं कहते, जो भारत को माता कहते हैं वे धरती का विभाजन स्वीकार करते हैं. जबकि हम इसे अस्वीकार करते हैं. ईश्वर एक है, धरती एक है, इसलिए सारी मानव जाती को भी अब एक हो जाना चाहिए.  
कौन विरोध करता है मेरी बात का 

Friday, September 24, 2010

National Harmony अयोध्या में हिन्दू मुस्लिम प्यार की बेनज़ीर मिसालें - Ejaz

सादिक़ मियां सिलते हैं रामलला के वस्त्र
राजीव दीक्षित, अयोध्या के दोराही कुआं के 45 साल सादिक अली उर्फ बाबू खान अपने को दुनिया का सबसे खुशनसीब मुसलमान मानते हैं। यह खुशनसीबी उन्हें दस वर्ष पहले हासिल हुई थी जब अयोध्या के विवादित स्थल पर विराजमान रामलला के मुख्य अर्चक (पुजारी) आचार्य सत्येन्द दास ने उनसे प्रभु के अंगवस्त्र सिलने की पेशकश की थी। तब से लेकर आज तक वह रामलला के कपड़े सिलते आ रहे हैं। मुसलमान दर्जी से प्रभु राम के कपड़े सिलवाने पर सवाल में छुपे संशय को भांपकर आचार्य सत्येन्द्र दास की उजली दाढ़ी के बीच मुस्कुराहट तैरती है। बोलते हैं, हिन्दू और मुसलमान, यह तय करने वाला मैं कौन होता हूं जब प्रभु राम स्वयं कहते हैं मम प्रिय सब मम उपजाये अर्थात मैंने ही सभी मानव को पैदा किया है, इसलिए मुझे सब प्रिय हैं। फिर आगे कहते हैं, रामराज्य की यह अवधारणा थी कि सब नर करहिं परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म सुनहि श्रुति नीति अर्थात जितने भी मानव हैं, वे परस्पर प्रेम करते हैं व अपनी परम्पराओं के अनुसार धर्मों का निर्वहन करते हैं। बाबू खान बड़ी सहजता से बताते हैं कि रामलला के रूप में भगवान बालस्वरूप में हैं, इसलिए उनका बागा (रामलला का अंगवस्त्र) सिलने के लिए मखमल के मुलायम कपड़े का इस्तेमाल होता है। वह बताते हैं कि रामलला हफ्ते के दिनों के हिसाब से वस्त्र धारण करते हैं। रविवार को वह गुलाबी, सोमवार को पूछने पर मिलता है जवाब मम प्रिय सब मम उपजाये सादिक मियां सिलते हैं रामलला के वस्त्र सादिक मियां.. सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को क्रीम कलर और शनिवार को नीले रंग का वस्त्र धारण करते हैं। बाबू खान पर सिर्फ रामलला के अंगवस्त्र ही नहीं, उनके सिंहासन की गद्दी और पर्दे को भी सिलने की जिम्मेदारी है। सिर्फ रामलला ही नहीं, अयोध्या के प्रमुख महंत भी उनके हुनर के मुरीद हैं। दिगम्बर अखाड़े के महंत और श्रीरामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष रहे स्वर्गीय रामचंद्र दास परमहंस को उनके हाथों का सिला बंगला कुर्ता और सदरी सुहाती थी तो हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञान दास ने भी जब तक कुर्ता धारण किया, उन्होंने उसे सिलवाने के लिए हमेशा बाबू खान को ही याद किया। निर्मोही अखाड़े के सरपंच महंत भास्कर दास और कनक भवन के चारों पुजारियों के कुर्ते सिलने की जिम्मेदारी भी बाबू खान पर ही है। यह विडम्बना ही है कि रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के जिस बहुचर्चित विवाद को लेकर अयोध्या बीते दो दशकों से सुर्खियों में आया, वहां के मठों से अमन व भाईचारे का ही पैगाम दिया जाता रहा है। हिन्दू समुदाय के एक वर्ग से नाराजगी मोल लेकर भी हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास ने वर्ष 2003 व 2004 में अपने आवास पर रमजान के महीने में इफ्तार आयोजित किया था। उन लम्हों को याद करके अयोध्या के मुसलमान आज भी भाववि ल हो जाते हैं। इतना ही नहीं, उसी वर्ष अयोध्या मुस्लिम वेलफेयर सोसाइटी की जानिब से बाबू खान के घर पर आयोजित ईद मिलन समारोह में वह 400 साधुओं की मंडली लेकर पहुंचे थे और वहां हनुमान चालीसा का पाठ किया था। हनुमानगढ़ी की 40 दुकानों के किरायेदार मुसलमान हैं लेकिन किसी को याद नहीं कि उनसे दुकानें खाली करने को कहा गया हो।
 http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=36&edition=2010-09-24&pageno=1

साभार- दैनिक जागरण दैनिक हिंदी समाचार पत्र
मेरठ संस्करण: शुक्रवार  24 , सितम्बर, 2010

Monday, September 20, 2010

Premsendes